Pankaj Awasthi 22 Apr

Pankaj Awasthi

प्रिय साथियों,
बहुत बड़े चित्रकार विनसेंट वानगॉग ने इस तरह के चित्र बनाए  कि लोग बड़े चकित होते थे। एक चित्र में झाड़ इतने ऊंचे चले गए, कि चांद-तारों को छू गए। किसी ने पूछा कि वानगॉग, हमने वृक्ष बहुत देखे हैं, मगर कोई वृक्ष चांद-तारों को नहीं छूता। वानगॉग ने उत्तर दिया :  मैं वृक्षों की आत्मा को पहचानता हूं। मैं उनके पास बैठा हूं। मैंने वृक्षों के भीतर झांका और देखा है। मैंने वृक्षों को अनुभव किया है। माना कि चांद-तारों तक पहुंच नहीं पाते लेकिन आकांक्षा है। पहुंचना चाहते हैं। हम सभी में  जिनके भीतर मनुष्य होने  का थोड़ा सा बोध है। जिन्हें यह पता है कि न मालूम कितनी योनियों  के बाद, न मालूम पशुओं, पक्षियों, पहाड़ों, वृक्षों की कितनी यात्राओं के बाद  मनुष्य होने की क्षमता मिली है।  उन्हें ही  विनसेंट वानगॉगके ह्रदय का पता चलेगा उन्हें ही इस जीवन की विशेष अनुकम्पा का पता चलेगा !
हम सभी की जीवन में कुछ अपने मापदंड हैं कुछ  गुफ्तगू है, संवाद है । यह जो सूरज छन-छन कर पड़ रहा है हरे वृक्षों से, इससे कभी बात करने का मन हमारा  को गले लगने का मन नहीं होता? कभी किसी फूल को खिले देख कर उसके पास नाचने का मन नहीं होता? तो फिर हम चूक रहे हैं फिर हमारी जिंदगी में राम नहीं है।हर घंटे एक एकड़ जमीन सॉइलइरोजन में नष्ट होती जा रही है, क्योंकि जंगल कट गए हैं। वृक्ष अपनी जड़ों से जमीन को रोके रखते हैं। जब वृक्ष नहीं रह जाते, तो जमीन पर पकड़ खो जाती है, तो जमीन बिखरने लगती है। अगर आप सब जंगल काट दें, तो जमीन सब बिखरकर नष्ट हो जाएगी।

वृक्ष जमीन को पकड़े हुए हैं। वृक्ष ही जमीन से भोजन नहीं ले रहे हैं, जमीन भी वृक्ष का सहारा ले रही है। और वृक्ष पूरे वक्त आकाश से तत्वों को खींचकर जमीन को दे रहे हैं। वृक्ष हट जाते हैं, जमीन बंजर हो जाती है, बांझ हो जाती है।

हमने जंगल काट डाले। सोचा कि जमीन चाहिए, मकान बनाने हैं। लेकिन जंगल ही काटने से जंगल ही नहीं कटते, वर्षा होनी बंद हो गयी। क्योंकि वे वृक्ष बादलों को भी निमंत्रण देते थे, बुलाते थे। अब बादल नहीं आते, क्योंकि वृक्ष ही न रहे जो पुकारें। उन वृक्षों की मौजूदगी के कारण ही बादल बरसते थे; अब बरसते भी नहीं; अब ऐसे ही गुजर जाते हैं। हमने जंगल काट डाले, कभी हमने सोचा भी नहीं कि जंगल के वृक्षों से बादल का कुछ लेना-देना होगा। यह तो बाद में पता चला जब हम जंगल साफ कर लिये। अब वृक्षारोपण करो। जिन्होंने वृक्ष कटवा दिये वही कहते हैं, अब वृक्षारोपण करो। अब वृक्ष लगाओ, अन्यथा बादल न आयेंगे। हमने तो सोचा था अच्छा ही कर रहे हैं; जंगल कट जायें, बस्ती बस जाये।

एक विराट भविष्य हमारे सामने है। अगर अब हमने नासमझी की तो आदमी को आत्महत्या करनी होगी ! अगर हमने थोड़ी समझदारी बरती; अगर हम नासमझियों से ऊपर उठ गए–तो पृथ्वी इतना सुरम्य स्वर्ग बन सकती है कि हमारी सारी कल्पनाएं फीकी पड़ जाएं! स्वर्ग की जो हमने कल्पनाएं की थीं, वे फीकी पड़ सकती हैं। शक्ति हमारे हाथ में है। समझ अभी हमारे हाथ में नहीं है। समझ को विकसित करना होगा ! आदमी को इस योग्य बनाना है कि वह विज्ञान के खतरों से बच सके और विज्ञान का सदुपयोग कर ले,  आदमी उतने योग्य नहीं है जितना कि विज्ञान ने उसे साधन दे दिए हैं। आदमी की योग्यता बढ़ानी है; उसे ध्यान देना है, उसे शांति देनी है, उसे आनंदमग्न होने की अवस्था देनी है, उसे थोड़ी करुणा देनी है, उसे थोड़ा प्रेम देना है।
पृकृति के प्रति सजग होने का समय आ गया है, थोड़ी संवेदनशीलता जगाएं ।

वह जो हमारे समक्ष पेड़ खड़े है, उसके पास भी आत्मा है, उसके भीतर भी परमात्मा है। वे भी जीवन से आपूरित हैं । चारों तरफ एक चैतन्य का विस्तार है। लेकिन जिसकी आंखें हृदय से संबंधित हो जाती हैं, केवल बुद्धि से संबंधित नहीं रहतीं, उसे जीवन में चारों तरफ चैतन्य का बहना दिखने लगता है।

संवेदनशील हृदय  न हो, तो संसार में पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। और संवेदनशील हृदय हो, तो संसार में परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
धन्यवाद !!